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जानिए सकट चौथ की तिथि, महत्व और पूजा विधि के बारे में

Know about the date, importance and worship method of sakat chauth
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हिंदू धर्म में चतुर्थी तिथि का विशेष महत्व है, जो हर माह भगवान श्रीगणेश की पूजा के लिए समर्पित होती है। माघ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को सकट चौथ या तिल चौथ कहा जाता है, जो इस दिन भगवान गणेश और चंद्र देव की पूजा का महत्वपूर्ण दिन होता है। इस दिन विशेष रूप से महिलाएं संतान की लंबी उम्र और सुख-समृद्धि के लिए व्रत करती हैं। 

सकट चौथ की तिथि - 

सकट चौथ का व्रत 17 जनवरी 2024, शुक्रवार को रखा जाएगा। इस दिन चतुर्थी तिथि सुबह 4 बजकर 6 मिनट से प्रारंभ होगी और 18 जनवरी को सुबह 5 बजकर 30 मिनट तक रहेगी। व्रत के दिन चंद्रोदय समय रात 9 बजकर 9 मिनट है। अमृत मुहूर्त सुबह 9 बजकर 52 मिनट से 11 बजकर 11 मिनट तक रहेगा, जो पूजा के लिए सबसे उपयुक्त समय है।

सकट चौथ का महत्व - 

सकट चौथ का व्रत विशेष रूप से संतान सुख और जीवन की समस्याओं के समाधान के लिए किया जाता है। यह व्रत माघ माह की कृष्ण पक्ष की चतुर्थी को भगवान गणेश और चंद्र देव की पूजा करके रखा जाता है। मान्यता है कि इस दिन व्रत रखने से घर में सुख-समृद्धि बनी रहती है, संतान की उम्र लंबी होती है और जीवन की परेशानियों का अंत होता है। साथ ही, यह व्रत महिलाओं द्वारा बच्चों की सलामती के लिए भी किया जाता है।

सकट चौथ व्रत पर भगवान गणेश को लगाएं ये भोग - 

सकट चौथ व्रत के दिन भगवान गणेश को विशेष भोग अर्पित किया जाता है। इनमें बूंदी के लड्डू, गन्ना, शकरकंद, गुड़ और तिल से बनी चीजें शामिल हैं। इन भोगों को भगवान गणेश को अर्पित करने से व्रती के जीवन में सुख और समृद्धि का वास होता है।

सकट चौथ की कथा - 

सकट चौथ की कथा भगवान गणेश से जुड़ी एक महत्वपूर्ण घटना पर आधारित है। एक बार माता पार्वती स्नान करने जाने से पहले गणेश जी को घर के बाहर पहरा देने का आदेश देती हैं। इस दौरान भगवान शिव ने घर में प्रवेश करने का प्रयास किया, लेकिन बाल गणेश ने उन्हें रोक लिया। इससे नाराज होकर भगवान शिव ने त्रिशूल से गणेश जी का सिर काट दिया। जब माता पार्वती ने यह देखा, तो वे बहुत दुखी हुईं और भगवान शिव से गणेश जी के प्राण वापस लाने की प्रार्थना की। भगवान शिव ने हाथी का सिर लगाकर गणेश जी को नया जीवन दिया। इस घटना के बाद से सकट चौथ का व्रत शुरू हुआ और यह व्रत संतान की सलामती और समस्याओं के समाधान के लिए मनाया जाने लगा।

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