उत्तर प्रदेश सरकार द्वारा वृंदावन में प्रस्तावित बांके बिहारी कॉरिडोर निर्माण परियोजना ने गहरा विवाद खड़ा कर दिया है। अनुमानित 500 करोड़ रुपये की लागत से बनने वाला यह प्रोजेक्ट करीब 5 एकड़ में फैला होगा। मंदिर परिसर और परिक्रमा मार्ग को विस्तार देने के उद्देश्य से बन रहे इस कॉरिडोर को लेकर मंदिर से जुड़े गोस्वामी समाज ने खुला विरोध किया है।
गोस्वामी समाज का कहना है कि कॉरिडोर बनने से वृंदावन की प्राचीन कुंज गलियां, लोक संस्कृति, दुकानें और पारंपरिक जीवनशैली खत्म हो जाएगी। इसके अलावा, वे मंदिर ट्रस्ट के फंड के इस्तेमाल और भूमि अधिग्रहण में मनमानी को लेकर भी सवाल उठा रहे हैं। उनका आरोप है कि सरकार उनकी अनुमति और सहमति के बिना जबरन मंदिर को बदलना चाह रही है।
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने परियोजना को मंजूरी दी है और मंदिर ट्रस्ट की जमीन अधिग्रहण को भी हरी झंडी दिखाई है, लेकिन साथ ही यह भी स्पष्ट किया है कि अधिग्रहित भूमि बांके बिहारी जी के नाम पर ही दर्ज होगी। अब सुप्रीम कोर्ट मंदिर फंड के उपयोग से जुड़ी याचिका पर 29 जुलाई को सुनवाई करेगा।
योगी सरकार इस परियोजना को प्रदेश के धार्मिक पर्यटन और भीड़ प्रबंधन के लिहाज से एक ड्रीम प्रोजेक्ट मान रही है। तीन हिस्सों में बनने वाले इस कॉरिडोर में एंट्री के लिए 3 गेट, बड़ी पार्किंग और चौड़ा रास्ता बनाया जाएगा। सीएम योगी के सलाहकार अवनीश अवस्थी खुद विरोध करने वालों से बातचीत के लिए वृंदावन पहुंचे।
इस मुद्दे ने अब राजनीतिक रंग भी ले लिया है। जहां कांग्रेस गोस्वामी समाज के समर्थन में है और प्रोजेक्ट का विरोध कर रही है, वहीं बीजेपी इसे भक्तों की सुविधा और पर्यटन विकास के लिए जरूरी कदम बता रही है। मथुरा सांसद हेमा मालिनी भी बार-बार इस प्रोजेक्ट के समर्थन में उतर रही हैं।
अब मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है, वहीं जमीन पर विरोध भी लगातार जारी है। अगर सरकार विरोध कम करने में सफल रही, तो आने वाले वर्षों में बांके बिहारी मंदिर में दर्शन करना न केवल आसान होगा, बल्कि वृंदावन को एक नई पहचान भी मिल सकती है।
















